इंजीनियर ने सरकारी नौकरी छोड़ बदली अपनी किस्मत, शुरु की एलोवेरा की खेती..आज हैं करोड़पति

इंजीनियर ने सरकारी नौकरी छोड़ बदली अपनी किस्मत, शुरु की एलोवेरा की खेती..आज हैं करोड़पति

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  • 2018-03-12
  • Tara Chand

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THEHOOK DESK:एक बार हार ना मानने की कसम खा लीजिए...फिर देखना किस्मत कैसे बदलती है। हरीश धनदेव वों नाम जो जिंदगी में कुछ अलग करने के लिए आगे बढ़े। उन्होंने जैसलमेर की नगरपालिका में जूनियर इंजीनियर की पद महज दो महीने में ही छोड़ दी। वो दिन-रात इस नौकरी से अलग कुछ करने का सोचते थे। कुछ अलग करने की चाहत इतनी बढ़ गई, कि वे नौकरी छोड़कर अपने लिए क्या कर सकते हैं इस पर रिसर्च करने लगे। फिर एक व्यक्ति ने उन्हें  एलोवेरा की खेती करने की सलाह दी।
साल 2012 में जयपुर से बीटेक करने के बाद जैसलमेर के हरीश ने MBA करने के लिए दिल्ली के एक कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन 2013 में सरकारी नौकरी लग गई थी। नौकरी छोड़ने के बाद हरीश एक बार फिर दिल्ली पहुंचे जहां उन्होंने खेती-किसानी पर आयोजित एक एक्सपो में नई तकनीक और नए जमाने की खेती के बारे में जानकारी हासिल की।
एक्सपो में एलोवेरा की खेती की जानकारी हासिल करने के बाद हरीश ने तय किया कि वे एलोवेरा ही उगाएंगे। हरीश को अपनी नई शुरुआत के लिए दिशा मिल चुकी थी। दिल्ली से लौटकर हरीश बीकानेर गए और एलोवेरा के 25 हजार प्लांट लेकर जैसलमेर लौटे।
कुछ लोगों ने हरीश को बताया कि "जैसलमेर में कुछ लोग इससे पहले भी एलोवेरा की खेती कर चुके हैं, लेकिन उन सभी को सफलता नहीं मिली। फसल को खरीदने कोई नहीं आया, जिसके चलते उन किसानों ने अपने एलोवेरा के पौधों को खेत से निकाल दूसरी फसलें लगा दी।" इस बात से हरीश के मन में थोड़ी आशंका तो हुई लेकिन उन्होंने इसके बारे में पता किया। हरीश ने काम को बेहतर तरीके से करने के लिए अपनी मार्केंटिग स्किल पर भी काम करना शुरू किया।
काफी खोज-बीन के बाद 2013 के आखिरी में एलोवेरा की खेती की शुरुआत हुई। बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय से 25 हजार प्लांट लाए गए और करीब 10 बीघे में उसे लगाया गया। आज की तारीख में हरीश 700 बीघे से भी ज्यादा में एलोवेरा की फार्मिंग करते हैं, जिसमें ज़मीन का कुछ हिस्सा हरीश का अपना खुद का है और बाकी का हिस्सा उन्होंने लीज पर ले रखा है। हरीश अपने काम के शुरुआती दिनों में नये-नये ही थे, इसलिए यदि ये कहा जाए कि वे सबकुछ जानते थे तो सही नहीं होगा। जब उन्होंने अपना एलोवेरा का काम शुरु किया तो उनकी उम्र 24 के आसपास थी। 
हरीश कहते हैं, "खेती की शुरुआत होते ही जयपुर से कुछ एजेंसियों से बातचीत हुई और अप्रोच करने के बाद हमारे एलोवेरा के पत्तों की बिक्री का एग्रीमेंट इन कंपनियों से हो गया।  उन्हें बड़े खरीदारों की तलाश थी, क्योंकि उनकी खेती का दायरा बढ़ने के साथ-साथ उत्पाद काफी मात्रा में आने लगे थे और यही वो समय था जब हरीश को पतंजलि के बारे में पता चला। फिर क्या था, हरीश ने पतंजलि को मेल भेजकर अपना परिचय दे डाला। उधर से पतंजलि का जवाब आया और उनसे मिलने पतंजलि टीम आई। ये हरीश का टर्निंग प्वाइंट टाईम था। पतंजलि के आने से चीजें बदलीं और आमदनी भी। करीब डेढ़ साल से हरीश एलोवेरा पल्प की सप्लाई बाबा रामदेव द्वारा संचालित पतंजली आयुर्वेद को करते हैं।
आज न सिर्फ हरीश की कंपनी ‘नेचरेलो एग्रो’ का विस्तार हुआ है, बल्कि कंपनी में काम करने वाले लोगों का भी आर्थिक विस्तार हुआ है। जैसलमेर नगरपालिका से इस्तिफे के बाद शुरु हुई कहानी ने हरीश को करोड़पति किसान बना दिया। हरीश की सफलता हिन्दी फिल्मों की हैप्पी एंडिंग वाली कहानी जैसी है।

 

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