दुनिया की सबसे ताकतवर खुफिया एजेंसी है इस देश के पास, अमेरिका भी खाता है खौफ, ऐसे करती है काम

दुनिया की सबसे ताकतवर खुफिया एजेंसी है इस देश के पास, अमेरिका भी खाता है खौफ, ऐसे करती है काम

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  • 2018-03-06
  • Tara Chand

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THEHOOK DESK:दुनिया में किसी भी देश की खुफियां एजेंसियां उनकी ताकत होती हैं। वह अपने देश के लिए अहम जानकारियां जुटाती हैं, ताकि दुश्मनों की नापाक हरकतों को मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके। रूस के पास भी ऐसी ही एक एजेंसी है, जिसे ‘गरू’ के नाम से जाना जाता है। ये एजेंसी दूसरे देशों पर नजर रखती है।
 
रूस की सेना के पास दुनिया की सबसे मजबूत सेना होने का गौरव प्राप्त है। रूस अपनी सेना की मजबूती के लिए आधुनिक हथियारों से लेकर प्रशिक्षण तक का इंतजाम करता है। रूस इस ताकत को कमतर नहीं होने देना चाहता है और दूसरे देशों की खुफिया जानकारी जुटाने के लिए खुफिया एजेंसी बनाई है।
साल 1800 के आसपास इस संगठन के लिए मसौदा तैयार किया गया। इस सेना अध्यक्ष माइकल बर्कले ने तैयार किया था। इसके बाद सरकार ने 1810 मंख एक खुफियां एजेंसी का गठन किया। शुरुआती दिनों में इसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं हो पाता था, लेकिन बाद में ये सेना की रीढ़ बन गई।
धीरे-धीरे ये खुफिया एजेंसी दुनिया में अपनी पैट बनाने लगी। तो इसे स्पेशल ब्यूरो के नाम से जाना जाने लगा। धीरे-धीरे ये रूसी सेना की एक अहम कड़ी बन गई। इस नाम में कई बार बदलाव किया गया। साल 1906 में इसे मेन इंटेलीजेंस डायरेक्टोरेट नाम दिया गया, जिसे गरु के नाम से भी जाना जाता है। साल 1992 में रक्षा मंत्रालय का अभिन्न अंग बन गया। इसके बाद इसकी जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं।
ये एजेंसी रूस की रीढ़ बन गई है। अब ये सिर्फ सेना की जानकारी ही सुरक्षित नहीं रखती है। बल्कि राजनीतिक जानकारियां, वैज्ञानिक जानकारियों को दुश्मनों के नजर से बचाती है। ‘गरु’ ने सेना में रहकर अपनी एक अलग सेना बना ली है। इस फोर्स को ‘स्पेत्सनाज’ कहा जाता है। गरु को कभी-कभी कुछ मुश्किल हालातों से गुजरना पड़ता है। उस समय यह अकेले सब कुछ नहीं कर सकते, ऐसे में उन्हें अपनी इस स्पेशल फोर्स की मदद लेनी पड़ती है। इसे रूस की सबसे पहली स्पेशल फोर्स माना जाता है। सेना से अलग यह पूरी तरह से ‘गरु’ के कहने पर ही काम करते हैं।
2010 में सेना ने इन्हें थोड़े समय के लिए अलग कर दिया था। इस फोर्स को थल सेना के साथ जोड़ दिया गया था। लेकिन 2013 में दोबारा यह ‘गरु’ के साथ जोड़ दिए गए। इस फोर्स को दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनाया गया था। वर्तमान में यह स्पेशल फोर्स की तरह हर तरह के खुफिया मिशन में अपनी भूमिका अदा करते हैं और ‘गरु’ का अहम अंग हैं।
बताया जाता है कि यह किसी भी हालत में अपनी जानकारी किसी को नहीं बताते हैं। हालात चाहे जो हो यह अपने काम से पीछे नहीं हटते हैं। यह रुस में सक्रिय अन्य एंजेसियों जैसे ‘केजीबी’ के रास्ते में नहीं आते और न ही वह इनके काम में टांग अड़ाती है। सरकार ने इन्हें ऐसा करने की सख्त हिदायत दे रखी है। ‘गरु’ अपने काम की रिपोर्ट सिर्फ अपने राष्ट्रपति को देती है।
‘गरु’ अपने जासूस और कर्मचारियों को फौज से चुनता है। अधिकतर लोगों को तो यह सेना की ट्रेनिंग खत्म होने के बाद ही अपने साथ जुड़ने का मौका दे देता है। वैसे सुनने में तो यह आसान लगता है, लेकिन इसके लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है उम्मीदवारों को अपने साथ जोड़ने की जो सबसे पहली चीज ‘गरु’ मांगता है वह है पढाई। उनका मानना है कि पढ़ने वाले व्यक्तियों में सीखने की क्षमता तेज होती है। इसलिए उन्हें पहला मौका दिया जाता है।
चुनाव की प्रक्रिया के बाद चयनित लोगों को कड़ी ट्रेनिंग से होकर गुजरना पड़ता है। इसकी ट्रेनिंग बहुत ही कठिन होती है। जिस समय इनकी ट्रेनिंग चल रही होती है। उस वक्त वो किसी और भी काम में लगे रहते हैं। वह लोग इन उम्मीदवारों की छानबीन करते हैं।
आखिरी पड़ाव में सभी कैंडिडेट्स को दूसरे देशों की भाषा सिखाई जाती है। रूस में अपने देश की भाषा को छोड़ कोई और भाषा कम ही बोली जाती है, इसलिए काफी सारे उम्मीदवारों के लिए नई भाषा सीखना मुश्किल होता है। विदेश जाने से महीने भर पहले इनका एक बार और टेस्ट होता है। उस टेस्ट में अगर इनमें थोड़ी सी भी कमी दिखाई पड़ती है, तो इन्हें बाहर कर दिया जाता है।

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