वो फिल्ममेकर जिन्होंने तमिल सिनेमा को बदल डाला, भारत सरकार भी कर चुके हैं सम्मानित

वो फिल्ममेकर जिन्होंने तमिल सिनेमा को बदल डाला, भारत सरकार भी कर चुके हैं सम्मानित

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  • 2018-02-14
  • niharika

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Thehook desk : बालानाथन "बालू" महेंद्रन भारत के फेमस फिल्ममेकर और सिनेमैटोग्राफर थे। उनका जन्म श्रीलंका के बैटिकालोवा में 20 मई 1946 में हुआ था।उन्होंने अपने फिल्म कैरियर की शुरूआत 1974 में एक मलयालम फिल्म नेल्लु के लिए कैमरामैन के रूप में किया, जिसने उन्हें भारत सरकार की ओर से सर्वश्रेष्ठ छायाकार का पुरस्कार दिलाया। उन्हें लगभग दस फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ छायाकार के रूप में चुना गया था।
एक निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म कोकिला थी, यह एक कन्नड़ फिल्म थी, जिसने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया। एज़्हीयाथा कोलंगल (1979)तमिल में उनकी पहली निर्देशित फिल्म थी। उन्हें तमिल के कुछ फिल्म निर्माताओं में माना जाता है, जो दृश्य रूप में कहानी कह सकने की योग्यता रखते हैं। 
उन्होंने हिन्दी में कमल हसन और श्रीदेवी के साथ सदमा फिल्म बनायी जो उनकी अपनी तमिल फित्म मुंदरम पिराई की रीमेक थी। इस फिल्म को उनके द्वारा बनायी गई फिल्मों में बेहतरीन माना जाता है। यह फिल्म दो मुख्य पात्रों के बीच रिश्ते में शामिल भावनाओं को बहुत ही अच्छे ढंग से दर्शाती है। उनके द्वारा बनाई गई एक अन्य हिंदी फिल्म और एक प्रेम कहानी है जो एक युवा और उलकी नौकरानी के बीच के प्रेम के बारे में है और इसे यथार्थवादी और सरल तरीके से दर्शाया गया है। उन्होंने एक मलयालम फिल्म यात्रा का निर्देशन किया जिसका तमिल में रीमेक किया गया था।
ऐसा माना जाता है कि महेंद्र ने डैविड लीन की फिल्म द ब्रीज इन द रिवर क्वाई की शुटिंग देखी और इतने प्रभावित हुए कि उन्होने फिल्मकार बनने का निर्णय ले लिया। फिल्म निर्देशक मणि रत्नम ने अपनी पहली कन्नड़ फिल्म पल्लवी अनु पल्लवी के छायांकन पर कार्य के लिए महेन्द्र से संपर्क किया। यह बताया गया है कि उन्होने रत्नम के साथ काम करने मना कर दिया क्योंकि वे उन्हें उस समय एक नौसिखिया के रूप में मानते थे। उसके बाद से ही उन्होंने रत्नम को उनके 'संक्रामक उत्साह' के लिए प्रशंसा किया। जब भी रत्नम ने उनसे संपर्क किया उन्होंने काम करने में झिझक महसूस नहीं किया। इसकी बजाय वे फिल्म को उत्साहपूर्वक करने पर तभी सहमत होते थे जब रत्नम उनसे मिलते और कहानी सुनाते थे।
एक छायाकार के रूप में महेंद्र की क्षमता ने कहानी को आगे बढ़ाने के एक प्रभावकारी माध्यम के रूप में दृश्यों के उपयोग में सहायता किया। उन्होंने तमिल सिनेमा में एक क्रांतिकारी परिवर्तन किया, उन्होंने लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और बुढ़ापे जैसे सामाजिक मुद्दों को संध्या रागम जैसी फिल्मों में उठाया।

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