इस क्षत्रिय वीरांगना ने अकबर की 3,000 मुगल सैनिकों की सेना को युद्ध में 3 बार हराया था...

इस क्षत्रिय वीरांगना ने अकबर की 3,000 मुगल सैनिकों की सेना को युद्ध में 3 बार हराया था...

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  • 2018-02-14
  • niharika

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THE HOOK DESK : भारत के इतिहास में राजपूतो का एक अलग ही इतिहास रहा है जिनके शौर्य का लोहा पूरा भारतवर्ष मानता था। राजपूत अपनी मातृभूमि के लिए जान देने को तत्पर रहते थे। इन्हीं राजपूतो में से एक ऐसी रानी भी हुईं थी जिसके आगमन से मुगल तक कांप गए थे। वैसे राजपूतो में महिलाओं को महल से बाहर आने की अनुमति नहीं होती थी लेकिन रानी दुर्गावती ने राजपूतों की इस प्रथा को तोड़ते हुए बहादुरी के साथ रणभूमि में युद्ध किया था।
 अन्य राजपूतो की तरह रानी दुर्गावती ने भी दुश्मन के सामने कभी घुटने नहीं टेके थे। रानी दुर्गावती ना केवल एक वीर योद्धा बल्कि एक कुशल शाषक भी थीं जिसने अपने शाशनकाल में विश्व प्रसिद्ध इमारतों खजुराहो और कलिंजर का किला बनवाया था। अगर हम भारत की महान और वीर औरतों की बात करें तो रानी लक्ष्मीबाई की तरह रानी दुर्गावती का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में राजपुताना में लिखा जाता है।
 
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 ईस्वी को एक एतेहासिक राजपुताना परिवार में हुआ था। रानी दुर्गावती के पिता चंदेल राजपूत शाषक राजा सालबान और मां का नाम माहोबा था। 1542 में दुर्गावती का विवाह गोंड साम्राज्य के संग्राम शाह के बड़े बेटे दलपत शाह के साथ करवा दिया गया। इस विवाह के कारण ये दो वंश एक साथ हो गए थे। चन्देल और गोंड के सामूहिक आक्रमण की बदौलत शेर शाह सुरी के खिलाफ धावा बोला गया था जिसमे शेरशाह सुरी की मौत हो गई थी।
1545 में दुर्गावती ने एक बालक वीर नारायण को जन्म दिया था। बालक के जन्म के 5 साल बाद ही दलपत शाह की मौत हो गई थी जिससे सिंहासन रिक्त हो गया था और बालक शिशु नारायण अभी गद्दी सम्भालने को सक्षम नही था। दलपत शाह के विरोधी एक योग्य उम्मीदवार की तलाश कर रहे थे तभी रानी दुर्गावती ने राजपाट खुद के हाथो में ले लिया और खुद को गोंड साम्राज्य की महारानी घोषित कर दिया। गोंड साम्राज्य का कार्यभार अपने हाथो में आते ही उसने सबसे पहले अपनी राजधानी सिंगुरगढ़ से चौरागढ़ कर दी क्योंकि नई राजधानी सतपुड़ा पहाड़ी पर होने की वजह से पहले से ज्यादा सुरक्षित थी।
रानी दुर्गावती ने अपने पहले ही युद्ध में भारत वर्ष में अपना नाम रोशन कर लिया था। शेरशाह की मौत के बाद सुरत खान ने उसका कार्यभार सम्भाला जो उस समय मालवा गणराज्य पर शाशन कर रहा था।सुरत खान के बाद उसके पुत्र बाजबहादुर ने कमान अपने हाथ में ली जो रानी रूपमती से प्रेम के लिए प्रसिद्ध हुआ था। सिंहासन पर बैठते ही बाजबहादुर को एक महिला शाषक को हराना बहुत आसान लग रहा था इसलिए उसने रानी दुर्गावती के गोंड साम्राज्य पर धावा बोल दिया।
बाज बहादुर की रानी दुर्गावती को कमजोर समझने की भूल के कारण उसे भारी हार का सामना करना पड़ा और उसके कई सैनिक घायल हो गए थे। बाजबहादुर के खिलाफ इस जंग में जीत के कारण पड़ोस के राज्यों में रानी दुर्गावती का डंका बज गया था। अब रानी दुर्गावती के राज्य को पाने की हर कोई कामना करने लगा था जिसमें से एक मुगल सूबेदार अब्दुल माजिद खान भी था।ख्वाजा अब्दुल मजिद आसफ खान कारा मणिकपुर का शाषक था जो रानी का नजदीकी साम्राज्य था। जब उसने रानी के खजाने के बारे में सुना तो उसने आक्रमण करने का विचार बनाया।
अकबर से आज्ञा मिलने के बाद आसफ खान भारी फौज के साथ गर्हा की ओर निकल पड़ा। जब मुगल सेना दमोह के नजदीक पहुंची  तो मुगल सूबेदार ने रानी दुर्गावती से अकबर की अधीनता स्वीकार करने को कहा। तब रानी दुर्गावती ने कहा “कलंक के साथ जीने से अच्छा गौरव के साथ मर जाना बेहतर है। मैंने लम्बे समय तक अपनी मातृभूमि की सेवा की है और अब इस तरह मै अपनी मातृभूमि पर धब्बा नही लगने दूंगी। अब युद्ध के अलावा कोई उपाय नही है।” रानी ने अपने 2000 सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार किया।असफ खान गर्हा पहुंच गया था और गणराज्यो को हथियाने का काम उसने शुरू कर दिया था। जब उसने रानी के बारे में खबर सूनी तो वो अपनी सेना को गर्हा में छोड़कर उसके पीछे रवाना हो गया।आसफ खान की हलचल को सुनते हुए रानी ने अपने सलाहकारों और सैनिको को समझाते हुए कहा “हम कब तक इस तरह जंगलो में शरण लेते रहेंगे।” इस तरह रानी दुर्गावती ने एलान किया कि या तो वो जीतेंगे या वीरों की तरह लड़ते हुए शहीद हो जाएंगे।
अब रानी दुर्गावती ने युद्ध वस्त्र धारण कर सरमन हाथे पर सवार हो गईं। अब भीषण युद्ध छिड़ गया जिसमें दोनों तरफ के सैनिकों को काफी क्षति पहुंची। इस युद्ध में रानी विजयी हुईं। 3 बार उसने अकबर की सेना को धुल चटाकर हरा दिया था लेकिन इस युद्ध में उनका पुत्र राजा वीर बुरी तरह घायल हो गया था जो मुगलों के साथ वीरता से लड़ रहा था। 
24 जून 1564, अब भी रानी बाहादुरी के साथ लड़ रही थी तभी अचानक एक तीर रानी दुर्गावती की गर्दन के एक तरफ घुस गया। रानी दुर्गावती ने बाहुदुरी के साथ वो तीर बाहर निकाल दिया लेकिन उस जगह पर भारी घाव बन गया था। इस तरह एक ओर तीर उनकी गर्दन के अंदर घुस गया जिसको रानी दुर्गावती ने बाहर निकाल दिया लेकिन वो बेहोश हो गईं। जब उन्हें होश आया तो पता चला कि उनकी सेना युद्ध हार चुकी थी। उन्होंने महावत से कहा “मैंने हमेशा से तुम्हारा विश्वास किया है और हर बार की तरह आज भी हार के मौके पर तुम मुझे दुश्मनों के हाथ मत लगने दो और वफादार सेवक की तरह इस तेज छुरे से मुझे खत्म कर दो।"
महावत ने मना करते हुए कहा “मैं कैसे अपने हाथो को आपकी मौत के लिए उपयोग कर सकता हूं, जिन हाथों को हमेशा मैंने आपसे ऊपहार के लिए आगे किया था, मैं बस आपके लिए इतना कर सकता हूं कि आपको इस रणभूमि से बाहर निकाल सकता हूं, मुझे अपने तेज हाथी पर पूरा भरोसा है।” ये शब्द सुनकर वो नाराज हो गईँ और बोली “क्या तुम मेरे लिए ऐसे अपमान को चयन करते हो” तभी रानी दुर्गावती ने चाक़ू निकाला और अपने पेट में घोंप दिया और वीरांगना की तरह वीरगति को प्राप्त हो गईँ। इसके बाद आसफ खान ने चौरागढ़ पर हमला बोल दिया तब रानी दुर्गावती का पुत्र उसका सामना करने के लिए आया लेकिन उसे मार दिया गया। रानी दुर्गावती की सारी सम्पति आसफ खान के हाथो में आ गई। रानी दुर्गावती ने इस तरह 16 सालों तक वीरांगना की तरह शाषन करते हुए राजपूत रानी के रूप में एक मिसाल कायम की जिसे भारतवर्ष कभी नहीं भुला सकता है।

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