काला पानी की सजा का नाम सुनकर खौफजदा हो जाते हैं लोग, आखिर ऐसा क्या होता इसकी जेल में

काला पानी की सजा का नाम सुनकर खौफजदा हो जाते हैं लोग, आखिर ऐसा क्या होता इसकी जेल में

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  • 2018-02-13
  • Tara Chand

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THEHOOK DESK:200सालों तक अंग्रेजों ने भारतीयों पर बहुत सारे अत्याचार किए। उनकी सबसे क्रूर सजा में से एक थी काला पानी की सजा।आखिर ऐसा क्या था इस सजा में इसके बारे में सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
 
अंडमान निकोबार पर बनी जेल में आज भी काला पानी की दर्दनाक दास्तां गुंजती रहती है। आज ये एक राष्ट्रीय स्मारक है लेकिन बटुकेश्वर दत्त और वीर सावरकर जैसे अनेक सेनानियों के दर्द की कहानी आज भी यह जेल सुनाती है।
भारत जब गुलामी की बेड़ियों में बंधा हुआ था, अंग्रेजी सरकार भारतीयों जुल्म कर रही थी। हजारों सेनानियों को फांसी दे दी गई, तोपों के मुंह पर बांधकर उन्हें उड़ा दिया गया। कई ऐसे भी थे जिन्हें तिल तिलकर मारा जाता था, इसके लिए अंग्रेजों के पास सेल्युलर जेल का अस्त्र था।
इस जेल को सेल्युलर इसलिए नाम दिया गया था, क्योंकि यहां एक कैदी से दूसरे से बिलकुल अलग रखा जाता था। जेल में हर कैदी के लिए एक अलग सेल होती थी। यहां का अकेलापन कैदी के लिए सबसे डरावना होता था। यहां ना जाने कितने भारतीयों को फांसी की सजा दी गई और कितने मर गए इसका रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। लेकिन आज भी लोगों के जेहन में कालापानी शब्द भयावह जगह के रूप में बसा है। यह शब्द भारत में सबसे बड़ी और बुरी सजा के लिए एक मुहावरा बना हुआ है।
अंडमान के पोर्ट ब्लेयर सिटी में स्थित इस जेल की चाहरदीवारी इतनी छोटी थी कि इसे आसानी से कोई भी पार कर सकता है। लेकिन यह स्थान चारों ओर से गहरे समुद्री पानी से घिरा हुआ है, जहां से सैकड़ों किमी दूर पानी के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता है। यहां का अंग्रेज सुपरिंडेंट कैदियों से अक्सर कहता था कि जेल दीवार इरादतन छोटी बनाई गई है, लेकिन यहां ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां से आप जा सकें।
सबसे पहले 200 विद्रोहियों को जेलर डेविड बेरी और मेजर जेम्स पैटीसन वॉकर की सुरक्षा में यहां लाया गया। उसके बाद 733 विद्रोहियों को कराची से लाया गया। भारत और बर्मा से भी यहां सेनानियों को सजा के बतौर लाया गया था।
सुदूर द्वीप होने की वजह से यह विद्रोहियों को सजा देने के लिए अनुकूल जगह समझी जाती थी। उन्हें सिर्फ समाज से अलग करने के लिए यहां नहीं लाया जाता था, बल्कि उनसे जेल का निर्माण, भवन निर्माण, बंदरगाह निर्माण आदि के काम में भी लगाया जाता था। यहां आने वाले कैदी ब्रिटिश शासकों के घरों का निर्माण भी करते थे। 19वीं शताब्दी में जब स्वतंत्रता संग्राम ने जोर पकड़ा, तब यहां कैदियों की संख्या भी बढ़ती गई।
सेल्यूलर जेल का निर्माण 1896 में प्रारंभ हुआ और 1906 में यह बनकर तैयार हुई। इसका मुख्य भवन लाल ईंटों से बना है। ये ईंटें बर्मा से यहां लाई गईं, जो आज म्यांमार के नाम से जाना जाता है। इस भवन की 7 शाखाएं हैं और बीचोंबीच एक टावर है। इस टावर से ही सभी कैदियों पर नजर रखी जाती थी।
ऊपर से देखने पर यह साइकल के पहिए की तरह दिखाई देता है। टावर के ऊपर एक बहुत बड़ा घंटा लगा था, जो किसी भी तरह का संभावित खतरा होने पर बजाया जाता था।

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