दिल्ली छोड़ लौटी घर, शुरू की मशरूम की खेती, करोड़ों की बनाई कंपनी, हजारों को दिया रोजगार

दिल्ली छोड़ लौटी घर, शुरू की मशरूम की खेती, करोड़ों की बनाई कंपनी, हजारों को दिया रोजगार

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  • 2018-02-13
  • Tara Chand

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THEHOOK DESK:उत्तराखंड की दिव्या रावत ने खेती को एक अलग पहचान दी है। दिव्या ने खेती को मुनाफे का सौदा बनाया है। दिव्या खेती से करोड़ों रूपए कमाती हैं और हजारों महिलाओं को रोजगार भी देती हैं।

दिव्या रावत चमोली से 25 किलोमीटर दूर कोट कंडारा गांव की रहने वाली है और दिल्ली में पढ़ाई कर रही थी। साल 2013 में दिव्या वापस अपने गांव लौट गईं और मशरूम उत्पादन का काम शुरू किया। दिव्या रावत ने जब साल 2013 में खेती करने शुरू की तो पहले साल 3 लाख का मुनाफा हुआ। इसके बाद मुनाफा लगातार बढ़ता गया। उनका कहना है कि ये कोई भी साधारण परिवार का शख्स इस व्यवसाय को कर सकता है। दिव्या अभी 50 से ज्यादा यूनिट लग चुकी हैं, जिसमें महिलाएं और युवा काम करते हैं।
मशरूम की बिक्री और लोगों को ट्रेनिंग देने के लिए दिव्या ने मशरूम कम्पनी ‘सौम्या फ़ूड प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी’ भी बनाई है। इसका टर्नओवर इस साल के अंत तक करीब एक करोड़ रुपए सालाना का हो जाएगा। दिव्या ने खुद भी खेती की और हजारों लोगों को इसके लिए प्रेरित भी किया। पहाड़ों पर मशरुम 150 से 200 रुपये में फुटकर में बिकता है। ये लोग अब सर्दियों में बटन, मिड सीजन में ओएस्टर और गर्मियों में मिल्की मशरूम का उत्पादन करते हैं। बटन मशरूम एक महीने में ओएस्टर 15 दिन में और मिल्की मशरूम 45 दिन में तैयार हो जाता है।
दिव्या बताती हैं, पढ़ाई के दौरान जब कभी वो घर लौटती थीं अधिकांश घरों में ताले लटके मिलते थे। 4000 से 5000 की नौकरी के लिए स्थानीय लोग दिल्ली जैसे शहर भाग रहे थे। रोजगार के लिए पहाड़ों से पलायन करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
दिव्या की बदौलत अब इनमें से हजारों घरों में लोग 10-15 हजार रुपये की कमाई करते हैं। मशरूम ऐसी फसल है जिसमें लागत काफी कम आती है। 20 दिन में उत्पादन शुरु हो जाता है और करीब 45 दिन में ही लागत निकल आती है। दिव्या ने मशरूम की खेती को इतना सरल कर दिया है कि हर व्यक्ति इसे कर सकता है।
उत्तराखंड सरकार ने दिव्या के इस सराहनीय प्रयास के लिए उसे ‘मशरूम की ब्रांड एम्बेसडर’ घोषित किया। दिव्या और उनकी कंपनी अब तक उत्तराखंड के 10 जिलों में मशरूम उत्पादन की 53 यूनिट लगा चुके हैं। एक स्टेंडर्ड यूनिट की शुरुवात 30 हजार रुपये में हो जाती है जिसमे 15 हजार इन्फ्रास्ट्रक्चर में खर्च होता है जो दसियों साल चलता है, 15 हजार इसकी प्रोडक्शन कास्ट होती है।
ब्रांड अम्बेसडर होने के बावजूद वो रोड खड़े होकर खुद मशरूम बेचती हैं, जिससे वहां की महिलाओं की झिझक दूर हो और वो खुद मशरूम बेंच सके।

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