कभी साइकिल पर च्यवनप्राश बेचते थे बाबा रामदेव, आज खड़ा कर दिया 10 हजार करोड़ का कारोबार

कभी साइकिल पर च्यवनप्राश बेचते थे बाबा रामदेव, आज खड़ा कर दिया 10 हजार करोड़ का कारोबार

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  • 2018-01-14
  • Tara Chand

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THEHOOK DESK:बाबा रामदेव जिसे योगगुरु के नाम से जाना जाता है, उन्होंने दुनिया भर में योग का ऐसा डंका बजाया कि वो घर-घर तक पहुंच गया। जो योग आम लोगों से दूर हुआ करता था, बाबा ने उसकी रीपैकेजिंग कर टीवी और इंटनेट के माध्यम से आम लोगों तक पहुंचाया।
 धीरे-धीरे बाबा रामदेव खुद योग के एक बड़े ब्रांड बन गए, लेकिन आजकल बाबा योग से ज्यादा अपने कारोबार को लेकर चर्चा में है। बाबा के बनाए हुए प्रोडक्ट धीरे-धीरे घर-घर में पहुंच रहे हैं और बाबा खुद ब्रांड एंबेसडकर बनकर हर चैनल पर अपने प्रोडक्ट का प्रचार करते दिख रहे हैं। आखिर एक योगी कैसे बन गया अरबपति कारोबारी, जानिए...
बाबा रामदेव का जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ में 26 दिसंबर 1965 को हुआ था। रामदेव का वास्तविक नाम रामकृष्ण था उनकी मां का नाम गुलाबो देवी और पिता का नाम रामनिवास यादव है। उनके माता-पिता अनपढ थे और बेहद गरीब भी। रामदेव का बचपन गरीबी में गुजरा, हालात ऐसे थे कि एक ही पैजामे में 2-3 साल तक काम चलाना पड़ता था। दूसरे से किताबें मांगकर पढ़ाई करते थे।
मां-बाप की हालात का एहसास उन्हें छोटी सी उम्र में ही हो गया था, इसलिए वो घंटों खेत में काम करते। रामदेव ने शहजादपुर के सरकारी स्कूल से आठवीं तक पढाई की, लेकिन उस उम्र में ही उनका मन सांसारिक मोह माया से उबने लगा और घर से भागकर खानपुर के एक गुरुकुल में आचार्य प्रद्युम्न और योगाचार्य बलदेव जी से संस्कृत एवं योग की शिक्षा लेने जा पहुंचे।
रामदेव का ये फैसला उनके घरवालों को पसंद नहीं आया और उनके पिता गुरुकुल में जाकर उन्हें वापस लेकर आए। माता-पिता ने यहां तक कहा कि दोबारा गुरुकुल गए तो टांग तोड़ दूंगा, लेकिन कुछ दिन साथ रहने के बाद रामदेव दोबारा घर छोड़कर भाग गए और फिर गुरुकुल पहुंचे। उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 13 साल थी, इतनी कच्ची उम्र में गुरुकुल के सख्त नियमों का पालन करते-करते रामदेव धीरे-धीरे फौलाद बनते गए।
रामदेव के योगी बनने की कहानी शुरू होती है 1990 के करीब, जब रामदेव खानपुर के गुरुकुल से जींद कलवा गुरुकुल में आ गए थे। कलवा गुरुकुल में रहने के दौरान ही उन्होंने पास के गांवों के लोगों को योग सिखाना शुरू कर दिया था। रामदेव ने कलवा गुरुकुल को भी छोड़ दिया और हिमालय चले गए। पांच सालों तक वो हिमालय की पहाड़ियों में घूमते रहे और उसके बाद हरिद्वार आए। हरिद्वार आने के बाद उन्होंने सन्यास लेने का फैसला किया और वो रामकृष्ण से बाबा रामदेव बन गए। रामदेव हरिद्वार अपने गुरु शंकरदेव महाराज के आश्रम में रहा करते थे और वहीं से लोगों को योग की शिक्षा देनी शुरू कर दी।
रामदेव ने अपने दो दोस्तों बालकृष्ण और कर्मवीर के साथ मिलकर दिव्य योग ट्रस्ट की स्थापना की थी। दिव्य योग ट्रस्ट हरियाणा और राजस्थान के अलग-अलग शहरों में हर साल करीब पचास योग कैंप लगाता था, उन दिनों बाबा रामदेव अक्सर हरिद्वार की सड़कों पर स्कूटर दिख जाते थे। 2002 में गुरु शंकरदेव की सेहत खराब होने के बाद बाबा रामदेव ने खुद दिव्य योग ट्रस्ट कि जिम्मेदारी संभाली और अपने दोस्त बालकृष्ण को ट्रस्ट के फाइनेंस का जिम्मा संभालने को दिया। उनके दूसरे दोस्त कर्मवीर को ट्रस्ट का प्रशासक बनाया। इन तीनों ने साथ मिलकर पतंजलि योगपीठ इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा किया।

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