अपनी पेंशन से भरते हैं सड़कों के गड्ढे, ताकि एक्सिडेंट ना हो..

अपनी पेंशन से भरते हैं सड़कों के गड्ढे, ताकि एक्सिडेंट ना हो..

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  • 2017-12-18
  • Tara Chand

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THEHOOK DESK:अगर आंध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जिले से गुजरेंगे तो सड़क पर सफेद बाल, मोटे फ्रेम वाला चश्मा लगाये रिटायर रेलवे इंजिनियर मिल जाएगा। गंगाधर तिलक नाम के शख्स पिछले काफी दिनों से अपने मिशन पर लगे हैं। किसान परिवार में जन्मे तिलक दक्षिण रेलवे इंजिनियर के पद पर तैनात थे। 
2008 में उनका रिटायमेंट हो गया। जिसके बाद एक ओर जहां आमतौर पर लोग अपनी जिंदगी आराम से बिताने की ख्वाहिश रखते हैं तो वहीं दूसरी ओर तिलक ने सड़कों के गढ्ढे भरने का काम करके अपनी जिंदगी को समाजसेवा की खातिर समर्पित करने का फैसला कर लिया। उन्होंने तब से लेकर अब तक 1,124 गढ्ढे भरे हैं।
उन्होंने बताया कि 'सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करने के दौरान मुझे श्रमदान नाम की पहल के बारे में पता चला जिसके माध्यम से लोग शारीरिक रूप से समाजाकि कार्यों में अपना योगदान देते थे।' इसी दौरान वे अपनी कार से कहीं जा रहे थे। तभी सड़क पर एक गड्ढा आया और उनकी कार उसमें से होकर बाहर निकली। इसी दौरान वहां से गुजर रहे कुछ स्कूली बच्चों की ड्रेस पर कीचड़ गया और वे गंदे हो गए।
इसके बाद उन्होंने गढ्ढे भरने का काम शुरू किया। वे अपनी कार में हमेशा बोरे रखते थे और जहां भी गड्ढा मिला उसे भरने की कोशिश करते। इसके बाद उन्होंने 2011 में एक साल के लिए नौकरी छोड़ दी और पेंशन के पैसों से सड़कों को सही करने का जिम्मा संभाल लिया। इससे उनकी पत्नी को थोड़ा अजीब लगा क्योंकि वो नहीं चाहती थीं कि उनके पति कड़कती धूप में ऐसा काम करें। उन्होंने तो अमेरिका में रह रहे बेटे को भी फोन कर दिया कि वह यहां आकर देखे कि उनके पापा क्या कर रहे हैं।
लेकिन बेटा तो पिता के मिजाज का निकला। उसने तिलक को इस काम के लिए मना करने के बजाय उनके लिए एक फेसबुक पेज और एक वेबसाइट बना दी। ताकि उनकी इस मुहिम पर सरकार ध्यान दे और बाकी लोग भी उनकी मदद कर सकें। इसी से 'श्रमदान' पहल की शुरुआत हुई। इसके तहत कॉलेज के बच्चे और युवा उनकी मदद करने के लिए आगे आए। 
लोगों ने अपने इलाकों के गढ्ढों को पटवाने के लिए तिलक को फोन करना शुरू कर दिया। तिलक के बेटे ने इलाके के कमिश्नर से भी बात की और अपने पिता की मुहिम के बारे में बताया, लेकिन कमिश्नर ने तिलक को बुलाकर उन्हें आश्वासन दिया कि वो यह काम न करें। उनके काम को देखते हुए लोग भी जागरूक हुए और सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। 

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