इमरजेंसी के बाद जब हाथी पर सवार हुईं इंदिरा गांधी, तो सियासत में बदल गई उनकी इमेज

इमरजेंसी के बाद जब हाथी पर सवार हुईं इंदिरा गांधी, तो सियासत में बदल गई उनकी इमेज

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  • 2017-11-19
  • Shashi Kant

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THE HOOK DESK इंदिरा गांधी सत्ता से बेदखल थीं। देश में मोरारजी देसाई की सरकार थी। देशभर में जनता पार्टी का बोलबाला था। इंदिरा गांधी और कांग्रेस की हालत खस्ता थी। उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। लेकिन इस बीच इंदिरा गांधी हाथी पर सवार हुईं और फिर उनकी और कांग्रेस की किस्मत बदल गई।
साल 1977 का वक्त था। देश में जनता पार्टी की सरकार थी और इंदिरा गांधी के सितारे गर्दिश में थे। लेकिन मोरारजी देसाई की सरकार बनने के दो महीने के भीतर ही बिहार के पटना जिले के बेलछी गांव में एक ऐसी घटना घटी, जिसने इंदिरा गांधी का मौका दे दिया। बेलछी में 27 मई 1977 को 11 दलितों की हत्या कर दी गई। इस घटना से जनता पार्टी की सरकार की खूब आलोचना हुई।
पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने बेलछी जाने और पीड़ित परिवारों से मिलने का फैसला किया। 13 अगस्त 1977 को इंदिरा गांधी हाथी पर सवार होकर बेलछी पहुंची थीं। इंदिरा गांधी का ये दौरा दुनियाभर में चर्चा का विषय बन गया। जब इंदिरा गांधी बिहार गई थीं तो उन दिनों बरसात का मौसम था। बेलछी तक जाने का रास्ता काफी खतरनाक था। बाढ़ आई हुई थी। कच्चे रास्ते पर कीचड़ और जलजमाव था। हरनौत से बेलछी जाने का रास्ता करीब 15 किलोमीटर लंबा था। ये रास्ता बहुत खराब था।
इंदिरा गांधी का हरनौत से सफर एक जीप से शुरू हुआ। लेकिन जीप कुछ दूर जाकर कीचड़ में फंस गई। इंदिरा गांधी को आगे ले जाने के लिए एक ट्रैक्टर को मंगवाया गया। लेकिन ट्रैक्टर ने भी कीचड़ के सामने सरेंडर कर दिया। अब इंदिरा गांधी पैदल हो गई थीं और पार्टी के नेता उनके पीछे-पीछे। लेकिन रास्ता इतना आसान नहीं था। इसके बाद नारायपुर में इंदिरा गांधी को बेलछी पहुंचाने के लिए हाथा बुलाया गया। इंदिरा गांधी हाथी पर सवार हुई और बेलछी पहुंची। इंदिरा गांधी ने पीड़ित परिवारवालों का हालचाल पूछा और उनको मदद का भरोसा दिलाया।
इस यात्रा ने इंदिरा गांधी के लिए सियासत में आगे बढ़ने के रास्ते खोल दिये। इंदिरा गांधी की इमेज एक जनता के लिए काम करने वाले नेता की बनने लगी और एक बार फिर साल 1980 में बड़ी जीत के साथ इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आईं।
आज भी उस गांव में 400 घर हैं और तीन हजार आबादी है। ज्यादा आबादी दलित है। जिन परिवारों ने इस नरसंहार में अपनों को खोया था। उनको साल 1984 में जमीन के कागजात मिल गए थे। लेकिन आज तक उनको जमीन नसीब नहीं हुई है।

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