अंग्रेज नहीं चाहते थे देश में बने बावली, जानिए 3000 बावली बनने के पीछे क्या है कहानी

अंग्रेज नहीं चाहते थे देश में बने बावली, जानिए 3000 बावली बनने के पीछे क्या है कहानी

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  • 2017-09-14
  • Monika Singh

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THEHOOK DESK: अग्रेसन की बावली, चांद बावली के देखने के बाद कभी तो आपके दिमाग में ये ख्याल आया होगा कि इन्हें किसने बनाया?  कब बनाया? और इनको बनाने का क्या मकसद रहा होगा?
इन बावलियों को अंग्रेजी में “स्टेप वैल” कहते हैं। देश के बहुत सारे हिस्सों में जब पानी की समस्या जूझना पड़ता था। उस समय वहां के राजाओं मे इस समस्या के समाधान के लिए बावड़ी का निर्माण कराना उचित समझा। जब तालाबों और नदियों का पानी सूख जाता तब पानी की कमी को पूरा करना ही इन बावलियों का एकलौता उद्देश्य था।
स्टेप वैल को बनाने के लिए विशेष आर्किटेक्ट का प्रयोग किया जाता था जिसमें बहुमंजिला इमारतों के नीचे कुंए बनाये जाते थे और साथ ही इनको पास की नदियों और नहरों से जोड़ दिया जाता था। इनके चारों तरफ चौड़ी-चौड़ी सीढ़ियां बनायीं जाती और ऊपर से छत ताकि आने जाने वाले राहगीर तथा उनके घोड़े, यहां प्यास बुझाकर आराम कर सकें।
जानवरों का ध्यान रखते हुए इसमें एक स्लोप भी बनायीं जाती थी ताकि जानवरों को उतरने में कोई दिक्कत न हो। पानी गन्दा न हो इसलिए साल भर इन कुओं को ढक कर रखा जाता था। बारिश के दिनों में कुंओं के पानी का लेवल सबसे ऊपर की मंजिल तक पहुंच जाता था और गर्मियों के समय पानी के लिए सैकड़ों सीढियां उतरनी पड़ती थी। मध्यकालीन युग में लगभग 3000 “स्टेप वैल” बनवाये गए जिनमे से कुछ देखरेख ना होने के कारण सूख गए तो कुछ खंडहर बन गए।
अंग्रेज कुंओं के पानी को अन-हाइजिनिक मानते थे जो अनेक बीमारियों का कारण समझा जाता था जिसके चलते  कुछ कुंए ब्रिटिश सरकार द्धारा पाट दिए गए, वर्तमान में इनमे से कुछ कुंए कूड़े-करकट से भरे हुए हैं। आज भी उत्तरी भारत में सैकड़ों ‘स्टेप वैल’ देखने को मिलते हैं जिनमे से 30 दिल्ली में मौजूद हैं। दिल्ली में स्थित अग्रसेन की बावली’ राजस्थान की ‘चांद बावरी’ और अहमदाबाद की ‘अदलालज वाव’ ‘स्टेप वैल’ हैं जो शताब्दी पहले की कलाकारी, नक्काशी और बौद्धिक हुनर का परिचय दे रहे हैं।

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