इस मुस्लिम देश में है 'मां' का 300 वर्ष पुराना प्राचीन मंदिर, सालों से जल रही है माता की अखंड ज्योत

इस मुस्लिम देश में है 'मां' का 300 वर्ष पुराना प्राचीन मंदिर, सालों से जल रही है माता की अखंड ज्योत

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  • 2017-09-13
  • Ritesh Kumar

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THE HOOK DESK : हिंदू धर्म में कई तरह की मान्यताएं भरी पड़ी हैं। उनमें से एक है अग्नि देव की पूजा करना और इसे आस्था का प्रतीक भी माना गया है।
आपने कई सारे मंदिरों में अग्नि को जलते देखा होगा जिसे लोग बड़े ही विश्वास के साथ प्रणाम करते हैं। मां दुर्गा के मंदिरों में तो एक ज्वाला हमेशा जलती ही रहती है। 
उनमें से ही एक ऐसा मंदिर है अजरबैजान देश में जहां एक सुराखानी नामक स्थान है वहां मां भगवती का एक पवित्र मंदिर है जिसमें पिछले कई सालों से पवित्र अग्नि लगातार जल रही है। यहां कभी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमरती थी। लेकिन आज यहां इस मंदिर में सन्नाटा है, क्योंकि यह मंदिर एक मुस्लिम देश में है, जहां 95 फीसदी से भी ज्यादा मुस्लिम रहते हैं।
माता के इस मंदिर को आतिश का तथा टेंपल ऑफ फायर के नाम से भी जाना जाता है। सर्दियों के मौसम में यहां बहुत ज्यादा ठंड पड़ती है। और उस इलाके में तेज हवाएं चलती रहती है।
यह मंदिर टेंपल ऑफ फायर अग्नि को समर्पित है। इस मंदिर 'टेंपल ऑफ फायर' की इमारत किसी प्राचीन काल के गढ़ जैसी ही है। उसकी छत हिंदू मंदिरों की तरह है। इसके पास मां भगवती का त्रिशूल भी स्थापित है। माता के मंदिर के अंदर एक अग्निकुंड है, जिसमें स्वतः आग की लपटें प्रज्वलित होती रहती हैं। 
इस मंदिर के दीवारों पर कुछ लेख भी अंकित हैं। इन आलेखों में गुरुमुखी लिपि का इस्तेमाल किया गया है। ऐसा माना जाता है कि कई सालों पहले भारतीय कारोबारी इस रास्ते से होकर जाते थे। ऐसे में इन लोगों ने इस मंदिर को बनवाया था। 
इतिहासकारों के मुताबिक, इसे बुद्धदेव नाम के किसी शख्स ने बनाया था, जो हरियाणा के मादजा गांव के रहने वाले थे। वहां मौजूद एक अन्य शिलालेख के मुताबिक उत्तमचंद व शोभराज ने भी मंदिर निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी।
गौरतलब है कि अजरबैजान एक मुस्लिम देश है। किसी जमाने में यह सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था। और यहां एक म्यूजियम भी बनाया गया है। जहां पुरानी यादों को संजोकर रखा जाता है। इस म्यूजियम में व्यापारियों, धर्मगुरुओं, कर्मों के फल इत्यादि को बताने वाली आकृतियां बनी हुई है।
अजरबैजान की सरकार ने इस मंदिर को 1975 में स्मारक बना दिया। 1998 में इसे यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स के लिए नॉमिनेट किया गया था। इसके बाद वहां की सरकार ने 2007 में इस मंदिर को हिस्टॉरिकल आर्किटेक्चर रिजर्व घोषित कर दिया।

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