कानपुर का यह बूढ़ा बरगद है आजादी की निशानी, 135 क्रांतिकारियों को इस बरगद पर दी गई थी फांसी

कानपुर का यह बूढ़ा बरगद है आजादी की निशानी, 135 क्रांतिकारियों को इस बरगद पर दी गई थी फांसी

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  • 2017-08-13
  • Ritesh Kumar

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THE HOOK DESK : हमारा देश तो आजाद हो गया लेकिन यह इतनी आसानी से नहीं हुआ था। ये बात तो सभी जानते हैं। फिर 15 अगस्त यानि स्वतंत्रता दिवस भी है ऐसे में कई जगह खबरों में आपको क्रांतिकारी लोगों के बारे में पढ़ने को ढ़ेर सारी खबरें मिल जाएंगी।
लेकिन हम यहां आपको सभी की तरह जानकार क्रांतिकारियों की कहानी नहीं बताने जा रहे हैं। बल्कि हम यहां आपको एक ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं जिसका शायद ही इतिहास में कहीं उल्लेख मिले। 
हम बात कर रहे हैं कानपूर शहर के एक फूलबाग चौराहे पर स्थित नानाराव स्मारक के बारे में। यहां मौजूद एक बूढ़ा बरगद आज भी उन क्रांतिवीरो की याद को ताजा करता है। अंग्रेजो ने इस बूढ़े बरगद पर कई क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया था। इतिहासकारों के मुताबिक़ नानाराव पार्क में हुए बूढ़े बरगद का काण्ड बीबीघर और सती चौरा घाट से जुड़ा हुआ था। मगर इतिहासकार बताते हैं, इतिहास के पन्नो में इसका कोई जिक्र नहीं है।
135 क्रांतिकारियों को इस बरगद पर दी गई थी फांसी। इतिहासकार प्रो एस पी सिंह के मुताबिक़, "बीबीघर काण्ड को लेकर इंग्लैण्ड में भारी आक्रोश था, वहां के लोग सड़को पर नाटक करते थे जिसमे नानाराव के पुतले को फांसी पर लटका देते हैं। बढ़ते दबाब को देखते हुए अंग्रेजो ने कईबार नकली नानाराव को पकड़ फांसी पर लटका दिया। मगर असली नानाराव कभी अंग्रेजो के हाथ नहीं आए।
उसी दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने कानपुर में करीब 135 क्रांतिकारियों को इस पार्क में मौजूद बूढ़े बरगद की शाखाओं पर ज़िंदा लटका दिया था।" उन्होंने बताया, "बूढ़े बरगद पर लटकाए गए क्रांतिकारियों का साक्ष्य इतिहास में मौजूद नहीं है। इसपर लटकाए गए किसी भी क्रांतिकारियों के नाम का जिक्र इतिहास के पन्नों में नहीं है। बरगद के पेड़ पर क्रांतिकारियों के लटकाने का किस अंग्रेज अधिकारी ने आदेश दिया इसका भी जिक्र कहीं नहीं है।
इतिहास के पन्नों में बीबीघर और सतीचौरा घाट पर हुए नरसंहार के बारे में जिक्र तो है मगर बूढ़े बरगद पर क्रांतिकारियों को लटकाए जाने का साक्ष्य कहीं नहीं हैं।"
नानाराव पार्क में मौजूद बीबीघर के इस विशाल कुएं के अंदर 200 से ज्यादा अंग्रेजी महिलाओं और उनके मासूम बच्चो को क्रांतिकारियों के इशारे पर काटकर डाल दिया गया था। वहीं, बीबीघर के इस कुएं से 10 कदम के दूरी पर मौजूद एक बरगद के पेड़ पर सैकड़ो क्रांतिकारियों को अंग्रेजो ने ज़िंदा फांसी पर लटका कर बीबीघर काण्ड का बदला लिया था।
14 मई 1857 की दोपहर को दर्जनों नाव में अंग्रेज अधिकारी और उनके परिवार के सदस्य इलाहाबाद जाने के लिए नाव पर सवार हो रहे थे। एक ग़लतफ़हमी की वजह से एक अंग्रेज अधिकारी अचानक से गोली चलाने लगता है, जिसमे कई क्रांतिकारियों को गोली लग जाती है। इसके बाद वहा मौजूद क्रांतिकारियों ने अंग्रेजो के नाव पर धावा बोल नाव पर सवार एक-एक अंग्रेजों के मौत के घाट उतार दिए गए।
सभी अंग्रेजी महिलाओं और उनके बच्चो को नानाराव पार्क के बीबीघर रहने के लिए भेज दिया गया। सतीचौरा घाटकाण्ड के बाद बौखलाए अंग्रेजी हुकूमत ने धीरे-धीरे कानपुर को चारों तरफ से घेरना शुरू किया। विद्रोहियों के पांव उखड़ने लगे, नाना साहब बिठूर छोड़ अंडरग्राउंड हो गए। तात्याटोपे एमपी की तरफ पलायन कर जाते है।
इसी बीच 15 जुलाई 1857 को देर शाम बीबीघर में रह रही सभी महिलाओं और अबोध बच्चो के मौत के घाट उतार कर 16 जुलाई 1857 की सुबह इस कुएं में डाल दिया जाता है। बीबीघर काण्ड का आरोप नानाराव पर आया। इस काण्ड के बाद नानाराव अंग्रेजी हुकूमत के सबसे बड़े विलेन बन गए। इस घटना के बाद अंग्रेजो को जिसके ऊपर शक होता है, उस क्रांतिकारी के मौत के घाट उतार दिया जाता है।
इस दौरान कानपुर के आसपास के कई गांवो में आग लगा दिया। सड़क के किनारे पेड़ों पर क्रांतिकारियों के मारकर लटका दिए गए। इसके साथ ही बीबीघर काण्ड के पीछे किसका हाथ था ये आज भी रहस्य है। अंग्रेजो का आरोप था कि इसे नानाराव ने कानपुर से भागते समय आदेश दिया था, जबकि कुछ लोगों का कहना था कि तात्याटोपे के इशारे पर इस नरसंहार को अंजाम दिया गया।
नानाराव पार्क में अंग्रेजो के एक अफसर ने ही बीबीघर का निर्माण कराया था, जहां अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारी ठहरते था। उन्हें खुश करने के लिए कुछ भारतीय दलाल उनके पास भारतीय महिला और लड़कियां को भेजते थे। अंग्रेजो के लिए बीबीघर अय्यासी का अड्डा था। इस बीबीघर के भारतीय स्टाइल में बनाया गया था।
वर्तमान में अब इस पार्क का इस्तेमाल शहर के बड़े बुजुर्ग और महिलाए मार्निंग वॉक के लिए, जबकि युवा वर्ग खेलकूद के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

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