22 साल का वो वीर योद्धा जिसने 5 घुड़सवार और 25 तलवारबाजों के साथ कर दी मुगलों के खिलाफ बगावत

22 साल का वो वीर योद्धा जिसने 5 घुड़सवार और 25 तलवारबाजों के साथ कर दी मुगलों के खिलाफ बगावत

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  • 2017-08-03
  • Ritesh Kumar

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THE HOOK DESK : बुंदेला वीर महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड की शौर्य ,निर्भीकता और संघर्ष की परम्परा मूर्तिमान थी। उनका स्थान इतिहास में उन भारतीय वीरो के मध्य है जिन्होंने शिवाजी और राणा प्रताप भांति मुगल साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए जीवन भर संघर्ष किया और वह बुंदेलखंड के एक बड़े भूभाग को शक्तिशाली मुगल सम्राट के पंजो से मुक्त करा सके।
बुंदेलखंड में कई प्रतापी शासक हुए हैं। उनमें से एक बुंदेला राज्‍य की आधारि‍शला रखने वाले चंपतराय के पुत्र छत्रसाल महान शूरवीर और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल का जीवन मुगलों की सत्ता के खि‍लाफ संघर्ष और बुंदेलखंड की स्‍वतंत्रता स्‍थापि‍त करने के लि‍ए जूझते हुए नि‍कला।
महाराजा छत्रसाल अपने जीवन के अंतिम समय तक आक्रमणों से जूझते रहे। बुंदेलखंड केशरी के नाम से वि‍ख्‍यात महाराजा छत्रसाल के बारे में ये पंक्तियां बहुत प्रभावशाली है:
इत यमुना, उत नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस।
छत्रसाल सों लरन की, रही न काहू हौंस॥
मध्‍यकालीन भारत के बुंदेला राजपूत वंश के महाराजा छत्रसाल का जन्‍म साल 1649 में 4 मई को हुआ था। छत्रसाल (4 मई 1649 – 20 दिसम्बर 1731) भारत के मध्ययुग के एक प्रतापी योद्धा थे जिन्होंने मुगल शासक औरंगजेब से युद्ध करके बुन्देलखण्ड में अपना राज्य स्थापित किया और 'महाराजा' की पदवी प्राप्त की।
मुगल बादशाह औरंगजेब से लड़ाई की। बुंदेलखंड में अपनी रियासत बनाई और पन्‍ना के महाराजा बने। 1671 में छत्रपति शिवाजी से प्रभावित होकर उन्‍होंने 22 साल की उम्र में मुगलों के खिलाफ बगावत कर दी थी। उन्‍होंने पूर्व में चित्रकूट और पन्‍ना के बीच का इलाका और पश्चिम में ग्‍वालियर का बड़ा हिस्‍सा जीत लिया था।
5 घुड़सवार और 25 तलवारबाजों के साथ मुगलों से मुकाबला किया। मुगल जनरलों को उन्‍होंने धूल चटाई, उनमें रोहिल्‍ला खान, कालिक, मुनव्‍वर खान शामिल थे। कहते हैं उनके बचपन के साथी महाबली तेली ने उनकी धरोहर, थोड़ी-सी पैत्रिक संपत्ति के रूप में वापस की जिससे छत्रसाल ने 5 घुड़सवार और 25 पैदलों की छोटी-सी सेना तैयार कर ज्येष्ठ सुदी पंचमी रविवार वि॰सं॰ 1728 (सन 1671) के शुभ मुहूर्त में औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह का बिगुल बजाते हुए स्वराज्य स्थापना का बीड़ा उठाया।
औरंगजेब छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो पाया। उसने रणदूलह के नेतृत्व में 30 हजार सैनिकों की टुकडी मुगल सरदारों के साथ छत्रसाल का पीछा करने के लिए भेजी थी। छत्रसाल अपने रणकौशल व छापामार युद्ध नीति के बल पर मुगलों के छक्के छुड़ाता रहा। छत्रसाल को मालूम था कि मुगल छलपूर्ण घेराबंदी में सिद्धहस्त है। उनके पिता चंपतराय मुग़लों से धोखा खा चुके थे।
छत्रसाल ने मुगल सेना से इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित अनेक स्थानों पर लड़ाई लड़ी। छत्रसाल की शक्ति बढ़ती गयी। बन्दी बनाये गये मुगल सरदारों से छत्रसाल ने दंड वसूला और उन्हें मुक्त कर दिया। बुन्देलखंड से मुगलों का एकछत्र शासन छत्रसाल ने समाप्त कर दिया।
छत्रसाल के शौर्य और पराक्रम से आहत होकर मुग़ल सरदार तहवर ख़ाँ, अनवर ख़ाँ, सहरूदीन, हमीद बुन्देलखंड से दिल्ली का रुख़ कर चुके थे। बहलोद ख़ाँ छत्रसाल के साथ लड़ाई में मारा गया था। मुराद ख़ां, दलेह ख़ां, सैयद अफगन जैसे सिपहसलार बुन्देला वीरों से पराजित होकर भाग गये थे।
छत्रसाल के राष्ट्र प्रेम, वीरता और हिन्दूत्व के कारण छत्रसाल को भारी जन समर्थन प्राप्त था। छत्रसाल ने एक विशाल सेना तैयार कर ली। इसमें 72 प्रमुख सरदार थे। वसिया के युद्ध के बाद मुग़लों ने छत्रसाल को 'राजा' की मान्यता प्रदान की थी। उसके बाद छत्रसाल ने 'कालिंजर का क़िला' भी जीता और मांधाता चौबे को क़िलेदार घोषित किया। छत्रसाल ने 1678 में पन्ना में राजधानी स्थापित की। विक्रम संवत 1744 मे योगीराज प्राणनाथ के निर्देशन में छत्रसाल का राज्याभिषेक किया गया था।
मध्‍यप्रदेश में छत्‍तरपुर उन्‍हीं के नाम पर है और उनका राजसी परिवार आज भी वहीं रहता है।

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