भारत का नेपोलियन जिसने जीवन में कभी पराजय का स्वाद नहीं चखा

THE HOOK DESK : हमारे देश का इतिहास बहुत ही प्रभावशाली और सम्पन्न रहा है। हमारा इतिहास कई वीरों की कहानी छुपाए बैठा है, जिन्होंने कुछ ही समय में देश को बदल कर रख दिया।
  • 2017-05-13
  • Ritesh Kumar

THE HOOK DESK : हमारे देश का इतिहास बहुत ही प्रभावशाली और सम्पन्न रहा है। हमारा इतिहास कई वीरों की कहानी छुपाए बैठा है, जिन्होंने कुछ ही समय में देश को बदल कर रख दिया।

आपने बचपन में इतिहास के किताबों में ऐसे कई नाम पढ़े होंगे, जो अब आपके दिमाग में धुंधले पड़ गए होंगे। हमारे देश में कई वंशों ने शासन किया। लेकिन हर वंश से ऐसा एक शासक निकल आया है, जिसने अपने बहादुरी, न्याय और तेज दिमाग के दम पर इतिहास के पन्नों में अपनी जगह बना ली।
ऐसे ही राजाओं में एक राजा थे समुद्रगुप्त जिन्हें इतिहास ने महान बना दिया। चलिए एक नजर दौड़ाते हैं इस महान शासक के कारनामों पर। समुद्रगुप्त गुप्त वंश के साथ-साथ देश के भी महान शासकों में से एक था। उसका सबसे बड़ा लक्ष्य था अपना साम्राज्य का विस्तार करना। ये सब करना समुद्रगुप्त के लिए इतना आसान नहीं था, फिर भी उसने हार नहीं मानी।
समुद्रगुप्त (328-378 ई.) गुप्तवंशीय महाराजाधिराज चंद्रगुप्त प्रथम की पट्टमहिषी लिच्छिवि कुमारी श्रीकुमरी देवी का पुत्र। चंद्रगुप्त ने अपने अनेक पुत्रों में से इसे ही अपना उत्तराधिकारी चुना और अपने जीवनकाल में ही समुद्रगुप्त को शासनभार सौंप दिया था।
प्रजाजनों को इससे विशेष हर्ष हुआ था किंतु समुद्रगुप्त के अन्य भाई इससे रुष्ट हो गए थे और उन्होंने आरंभ में मृत्युयुद्ध छेड़ दिया था। भाइयों का नेता 'काच' था। काच के नाम के कुछ सोने के सिक्के भी मिले है। गृहकलह को शांत करने में समुद्रगुप्त को एक वर्ष का समय लगा। इसके पश्चात्‌ उसने दिग्विजययात्रा की। इसका वर्णन प्रयाग में अशोक मौर्य के स्तंभ पर विशद रूप में खुदा हुआ है। 
एक समय ऐसा भी आया था, जब समुद्रगुप्त की तुलना अशोक के साथ किया जाने लगा था। चन्द्रगुप्त ने अपने जीवन काल में ही समुद्रगुप्त को शासन सौंप दिया था, पर इस बात से उसके बाकी भाई उसके जान के प्यासे हो गए थे।
जिस समय समुद्रगुप्त दक्षिण विजययात्रा पर थी उस समय उत्तर के अनेक राजाओं ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर विद्रोह कर दिया। लौटने पर समुद्रगुप्त ने उत्तर के जिन राजाओं का समूल उच्छेद कर दिया उनके नाम हैं : रुद्रदेव, मतिल, नागदत्त, चंद्रवर्मा, गणपति नाग, नागसेन, अच्युत नंदी और बलवर्मा। इनकी विजय के पश्चात्‌ समुद्रगुप्त ने पुन: पुष्पपुर (पाटलिपुत्र) में प्रवेश किया। इस बार इन सभी राजाओं के राज्यों को उसने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। आटविक राजाओं को इसने अपना परिचारक और अनुवर्ती बना लिया था। इसके पश्चात्‌ इसकी महती शक्ति के सम्मुख किसी ने सिर उठाने का साहस नहीं किया।
सभी नृपतियों तथा यौधेय, मानलव आदि गणराज्यों ने भी स्वेच्छा से इसकी अधीनता स्वीकार कर ली। समहत (दक्षिणपूर्वी बंगाल), कामरूप, नेपाल, देवाक (आसाम का नागा प्रदेश) और कर्तृपुर (कुमायूँ और गढ़वाल के, पर्वतप्रदेश) इसकी अधीनता स्वीकार कर इसे कर देने लगे। मालव, अर्जुनायन, यीधेय, माद्रक, आभीर, प्रार्जुन, सनकानीक, काक और खर्परिक नामक गणराज्यों ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। दक्षिण और पश्चिम के अनेक राजाओं ने इसका आधिपत्य स्वीकार कर लिया था और वे बराबर उपहार भेजकर इसे संतुष्ट रखने की चेष्टा करते रहते थे, इनमें देवपुत्र शाहि शाहानुशाहि, शप, मुरुंड और सैहलक (सिंहल के राजा) प्रमुख है।
विश्व पटल पर समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन बताया गया है। कहा जाता है कि समुद्रगुप्त ने अपने जीवन में कभी पराजय का स्वाद नहीं चखा। समुद्रगुप्त के बारे मे स्मिथ ने सही कहा है कि समुद्रगुप्त "भारत का नेपोलियन" था।
समुद्रगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में गांधार से लेकर पूर्व में आसाम तक तथा उत्तर में हिमालय के कीर्तिपुर जनपद से लेकर दक्षिण में सिंहल तक फैला हुआ था। प्रयाग की प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के सांधिविग्रहिक महादंडनायक हरिपेण ने लिखा है, 'पृथ्वी भर में कोई उसका प्रतिरथ नहीं था। सारी धरित्री को उसने अपने बाहुबल से बाँध रखा था।' अपनी कुशाग्र बुद्धि और संगीत कला के ज्ञान तथा प्रयोग से उसने ऐसें उत्कृष्ट काव्य का सर्जन किया था कि लोग 'कविराज' कहकर उसका सम्मान करते थे।'
समुद्रगुप्त के सात प्रकार के सिक्के मिल चुके हैं, जिनसे उसकी शूरता, शुद्धकुशलता तथा संगीतज्ञता का पूर्ण आभास मिलता है। इसने सिंहल के राजा मेघवर्ण को बोधगया में बौद्धविहार बनाने की अनुमति देकर अपनी महती उदारता का परिचय दिया था। यह भारतवर्ष का प्रथ आसेतुहिमाचल का सम्राट् था। इसकी अनेक रानियों में पट्टमहिषी दत्त देवी थी, जिनसे सम्राट् चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने जन्म दिया था।

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